आज 19 अक्टूबर को शारदीय नवरात्र का तीसरा दिन है जो मां चंद्रघंटा को समर्पित है। मां चंद्रघंटा को परम शांतिदायक और कल्याणकारी माना गया है। मां चंद्रघंटा की विधि पूर्वक पूजा से अलौकिक ज्ञान की प्राप्ति होती है, भय और रोग से मुक्ति मिलती है, साहस और सौम्यता में वृद्धि होती है। सबसे बड़ी बात है कि चंद्रघंटा शक्ति की पूजा से मणिपुर चक्र जाग्रत होता है। इसीलिए कोरोनाकाल में यह पूजा भक्तों को विशेष राहत दे सकती है।

आइये मणिपुर चक्र को ठीक से समझते हैं
मणिपुर चक्र तंत्र और योग साधना की चक्र संकल्पना का तीसरा चक्र है। मणि यानी गहना और पुर यानी स्थान। यह नाभि के पीछे स्थित है। इसका आधार तत्व अग्नि होने के कारण इसे ‘अग्नि’ या ‘सूर्य केंद्र’ भी कहते हैं। मान्यता हैं कि मां चंद्रघंटा की पूजा और साधना से साधक की कुंडली का मणिपुर चक्र जाग्रत हो जाता है।

मणिपुर चक्र जाग्रत होने से जातक को स्पष्टता, आत्मविश्वास, आनंद, ज्ञान, बुद्धि और विवेक जैसे बहुमूल्य मणियों सरीखे गुण प्राप्त होते हैं। यह चक्र स्फूर्ति का केंद्र है। यह चक्र साधक का स्वास्थ्य सुदृढ़ करने के लिए उसकी ऊर्जा को नियंत्रित करता है। ब्रह्माण्ड से प्राण को अपनी ओर आकर्षित करता है, अग्न्याशय और पाचक तंत्र को नियमित करता है। और, सबसे खास बात यह है कि कोरोना यानी कोविड-19 जैसे परिसंचारी रोगों से जातक की रक्षा भी करता है।

इस चक्र का प्रतिनिधि रंग पीला है। इसका प्रतीक चिह्न दस पंखुडिय़ों वाला कमल है जो मानव शरीर की सभी प्रक्रियाओं का नियंत्रण और पोषण करने वाले दस प्राणों (शक्तियों) का प्रतीक है। इसका दूसरा प्रतीक नीचे की ओर शीर्ष बिन्दु वाला त्रिभुज है। यह ऊर्जा के फैलाव, उद्गम और विकास का प्रतीक है। इस चक्र के देवता विष्णु और लक्ष्मी हैं। विष्णु उदीयमान मानव चेतना के प्रतीक हैं। लक्ष्मी भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि की प्रतीक हैं।

मां चंद्रघंटा का रुप
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां चंद्रघंटा के मस्तिष्क पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। मां का रंग रूप सोने के समान है, दस हाथ हैं जिनमें शस्त्र-अस्त्र विभूषित हैं और मां चंद्रघंटा की सवारी है सिंह।

मां चंद्रघंटा पूजा विधि
मां चंद्रघंटा की पूजा शुभ मुहूर्त में प्रारंभ करनी चाहिए। पूजा से पूर्व मां को केसर और केवड़ा जल से स्नान कराएं, सुनहरे वस्त्र पहनाएं। इसके बाद कमल और पीले गुलाब की माला चढ़ाकर मिष्ठान, पंचामृत और मिश्री का भोग लगाएं।

मां चंद्रघंटा का मंत्र
1
या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:।।
2
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।

मां चंद्रघंटा की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार जब दैत्यों का आतंक बढ़ने लगा तो मां दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का अवतार लिया। असुरों का स्वामी महिषासुर था, जो देव राज इंद्र का सिंहासन प्राप्त कर स्वर्गलोक पर राज करना चाहता था। इससे परेशान होकर सभी देवता भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सामने उपस्थित हुए। देवताओं की बात सुनकर तीनों को ही क्रोध आया।

इस इस क्रोध में तीनों के मुख से जो ऊर्जा उत्पन्न हुई, उससे एक देवी अवतरित हुईं। भगवान शंकर ने इस देवी को अपना त्रिशूल और भगवान विष्णु ने चक्र प्रदान किया। अन्य देवी देवताओं ने भी माता के हाथों में अपने अस्त्र सौंप दिए। देवराज इंद्र ने देवी को एक घंटा दिया। सूर्य ने अपना तेज और तलवार दी, सवारी के लिए सिंह प्रदान किया।

इसके बाद मां चंद्रघंटा महिषासुर के पास पहुंची। मां का ये रूप देखकर महिषासुर को अपने काल का अहसास हो गया। मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का संहार कर देवताओं की रक्षा की।










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