शिवहरे वाणी नेटवर्क
आगरा।
पांच दिवसीय दीपोत्सव का आज दूसरा दिन है, जिसे नरक चौदस कहते हैं। इसे छोटी दीवाली के रूप में भी जाना जाता है।छोटी दीवाली यूं तो गिनती के कुछ ही दीपक जलाए जाते हैं, लेकिन एक-एक दीया बड़े महत्व का होता है।

फिलहाल इस साल दीपोत्सव में तिथियों को लेकर अजीब स्थिति बन गई है। धनतेरस की तिथि की वजह से छोटी और बड़ी दिवाली एक ही दिन मनाई जाएगी। वैसे जिन लोगों ने 12 नवंबर को धनतेरस मना ली है, वे आज 13 तारीख को नरक चतुर्दशी मना सकते हैं और 14 तारीख को दिवाली है ही। जो लोग 13 नवंबर को धनतेरस मनाएंगे, वे दिवाली के दिन ही नरक चतुर्दशी भी मनाएंगे। लेकिन जहां तक दीपदान की बात है, तो यह 13 नवंबर की रात्रि में ही किया जाएगा। वृंदावन में स्वजातीय संत हरिदासजी ने शिवहरेवाणी को बताया है कि छोटी दिवाली को दीपदान के लिए कोई मुहूर्त नहीं,होता है, इसे किसी भी समय किया जा सकता है। दीप का महत्व चूंकि संध्या और रात्रि में अधिक होता है, लिहाजा 13 नवंबर की शाम से किसी भी समय दीप दान किया जा सकता है। अगली सुबह स्नान का मुहूर्त है। मंदिर राधाकृष्ण के पंडित अनिल चतर्वेदी जी का भी यही कहना है।,

वैसे छोटी दीवाली पर ज्यादातर घरों में 5 दीये जलाए जाने का प्रचलन है। एक दीया घर के मंदिर या पूजास्थल पर, दूसरा रसोई में, तीसरा उस स्थान पर जहां हम पीने का पानी रखते हैं, चौथा दीया पीपल या वट वृक्ष के नीचे रखा जाता है और पांचवा दीया घर के प्रवेश द्वार या मुख्यद्वार पर रखा जाता है। मुख्यद्वार पर रखा जाने वाला यह दीया चार मुंह का होना चाहिए और उसमें चार लंबी बत्तियां होनी चाहिए।

यह तो है 5 दीयों की बात, लेकिन छोटी दिवाली पर अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग संख्या में दीये जलाए जाते हैं। लेकिन, यह संख्या अक्सर विषम ही होती है। मसलन छोटी दिवाली पर कहीं कहीं 7, 13, 14 या 17 दीये जलाने की भी परंपरा है। यह संख्या अलग-अलग स्थानों पर या कुल में उनकी परंपरा और मान्यता पर आधारित होता है। लेकिन, छोटी दिवाली पर दीये कहां-कहां जलाए जाएं, इसका बहुत महत्व होता है। आइये इस बारे में जानते हैः-

पहला दीया रात में सोते वक्त यम के नाम का होता है जो पुराना दीया होता है और इसमें सरसों का तेल डालकर घर से बाहर दक्षिण की ओर मुख कर कूड़े के ढेर के पास रखा जाता है।
दूसरा दीया किसी सुनसान देवालय में रखा जाता है। यह घी का दीया होता है। इसे जलाने से कर्ज से मुक्ति मिलती है।
तीसरा दीया लक्ष्मीजी के समक्ष जलाते हैं।
चौथा दीया माता तुलसी के समक्ष जलाया जाता है।

पांचवा दीया घर के दरवाजे के बाहर जलाते हैं।
छठवां दीया पीपल के पेड़ के नीचे जलाते हैं।
सातवां दिया किसी मंदिर में जलाकर रख दिया जाता है।
आठवां दीया घर में कूड़ा कचरा रखने की जगह पर जलाते हैं।
नौवां दीया घर के बाथरूम यानी स्नानगृह में जलाते हैं।
दसवां दीया घर की छत की मुंडेर पर
ग्यारहवां दीया घर की छत पर जलाते हैं।
बारहवां दीया घर की खिड़की के पास जलाते हैं।
तेरहवां दीया घर की सीढ़ियों पर या बरामदे में जलाया जाता है।
चौरहवां दीया रसोई में या जहां पानी रखने का स्थान होता है, वहां जलाकर रखा जाता है।










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