शिवहरे वाणी नेटवर्क
आगरा/बाड़ी।
बाड़ी के व्यवसायी श्री लोकेंद्र शिवहरे की मौत को लेकर बड़ा सवाल उठ रहा है। बीती 23 मई की शाम को ब्रेन हैमरेज होने के बाद लोकेंद्र शिवहरे को आगरा के पुष्पांजलि अस्पताल लाया गया था, जहां उनकी गंभीर हालत को देख उन्हें आईसीयू में भर्ती करा दिया गया। आरोप लग रहे हैं कि आईसीयू में पांच घंटे तक लोकेंद्र शिवहरे को इलाज नहीं मिला..और इसी के चलते उनकी मौत हो गई। यदि शुरुआती घंटों में सही इलाज मिला होता तो उन्हें बचाया जा सकता था। सोमवार को बाड़ी मे लोकंद्र शिवहरे की उठावनी में भी इस बात की चर्चा वहां मौजूद समाजबंधुओं में रही। परिजन अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार कर रहे हैं। स्व. श्री लोकेंद्र शिवहरे के निकट संबंधी श्री दयानंद शिवहरे ने बताया है कि इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
शिवहरे वाणी को मिली जानकारी के अनुसार, बीती 23 मई की शाम को श्री लोकेंद्र शिवहरे आगरा में सदर भट्टी स्थित अपने प्रतिष्ठान पर बैठकर स्टाफ से बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें चक्कर आने का अहसास हुआ और बेहोशी सी छाने लगी। शाम साढ़े पांच बजे स्टाफ और निकट रिश्तेदार उन्हें लेकर पुष्पांजलि अस्पताल पहुंचे। वहां उनका सीटी स्कैन कराया गया जिसमें ब्रेन हैमरेज की पुष्टी हुई और ब्रेन में एक हल्का सा स्पॉट आया था। उन्हें तत्काल एडमिट करा दिया गया। लेकिन कोई डाक्टर देखने नहीं पहुंचा। ऐसे में तीमारदारों का बेचैन होना स्वाभाविक था। वे अस्पताल प्रशासन से बार-बार पूछ रहे थे कि डाक्टर कब आएगा और हर बार यही जवाब मिलता कि बस आने वाले हैं, आ रहे हैं।
रात जब दस बज गए तो सब्र का बांध टूट गया और परिजनों ने हंगामा कर दिया। मामला बिगड़ता देख स्टाफ ने बताया कि डाक्टर साहब आगरा में नहीं हैं। उसके बाद रात 10.40 पर जूनियर डाक्टर वहां पहुंचा और लोकेंद्र शिवहरे का दोबारा सीटी स्कैन कराया, उस रिपोर्ट में ब्रेन में वह छोटा सा स्पॉट दस गुना बढ़ चुका था। यानी जान को खतरा दस गुना हो गया था। परिजन उन्हें लेकर तत्काल गुड़गांव के फोर्टिस अस्पताल रवाना हो गए। वहां लोकेंद्र शिवहरे दो दिन तक मौत से जूझते रहे और 26 मार्च को उनका निधन हो गया। लोकेंद्र शिवहरे को यदि पुष्पांजलि में समय से उपचार मिल गया होता तो बहुत संभावना इस बात की है कि उन्हें बचा लिया गया होता। यह अफसोस परिजनों और रिश्तेदारों को साल रहा है। स्व. श्री लोकेंद्र शिवहरे के आगरा निवासी निकट रिश्तेदार श्री दयानंद शिवहरे ने इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर एक मुहीम भी छेड़ी है। शिवहरे वाणी ने जब इस बारे में पुष्पांजलि के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की तो वे कन्नी काटते नजर आए।
ऐसे मामलों में क्या कहता है कानून
ये हाल है हमारे यहां चिकित्सा सेवाओं का। बड़ी-बड़ी अत्याधुनिक और स्टेट-ऑफ-द-आर्ट टैक्नोलॉजी के प्रयोग का दावा करने वाले एक नामी अस्पताल में लापरवाही के ऐसे मामले सामने आते हैं तो साफ हो जाता है कि ये पूरी तरह धन कमाने के उद्देश्य से खोले गए हैं और इनमें सेवाभाव का एक अंश भी नहीं है। यही वजह है कि चिकित्सा सेवा को अब उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की परिधि में लाए जाने के प्रयास किये जा रहे हैं और खुद चिकित्सक इसके पक्ष में नहीं है।
मौजूदा कानूनों में भी ऐसी लापरवाही होने पर मरीज, संबंधित डॉक्टर या संबंधित नर्सिंग होम से क्षतिपूर्ति का दावा कर सकता है। अस्पताल के उत्तरदायित्व को स्पष्ट करते हुए न्यायालय ने कहा है, कि ''जब कभी किसी अस्पताल में किसी मरीज को इलाज के लिए लिया जाता है तो उस मरीज के प्रति सतर्कता बरतना उसका कर्तव्य हो जाता है। मरीज के इलाज के संबंध में कई काम ऐसे होते हैं जिसे अस्पताल के सहायकों द्वारा किया जाता है, सहायकों द्वारा की गयी लापरवाही के लिए संबंधित व्यक्ति के साथ-साथ अस्पताल प्रशासन पूर्णतया जिम्मेदार होता है।'' डॉक्टर द्वारा लापरवाही करने पर आपराधिक और सिविल दोनों प्रकार की कार्रवाई की जा सकती है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 (क) के अन्तर्गत, आपराधिक लापरवाही के लिए किसी डॉक्टर को सजा दी जा सकती है। इसके अन्तर्गत जो कोई भी व्यक्ति आपराधिक मानव-वध की श्रेणी में आने वाला उतावलेपन या लापरवाही का कोई काम करके किसी व्यक्ति की हत्या करता है, उसे दो साल तक के कारावास या जुर्माने या दोनों की सजा हो सकती है। यह संज्ञेय, जमानत योग्य और गैर समझौता योग्य होता है।








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