शिवहरे वाणी नेटवर्क
नीमच।
नाम ही परमेश्वर था उनका, सो जिंदगी भर गरीबों के मसीहा बनकर जिए…और, अब मृत्यु के बाद भी मानवता के हित में काम आएगी उनकी पार्थिव देह। मध्य प्रदेश में नीमच शहर के लोकप्रिय वयोवृद्ध चिकित्सक डा. परमेश्वर प्रसाद जायसवाल का निधन बीते शनिवार को हो गया। परिवारीजनों ने उनकी इच्छा और घोषणा का सम्मान करते हुए उनकी पार्थिव देह महर्षि दधीचि देह-अंगदान यज्ञ संस्थान को दान कर दी।
इस तरह डा. जायसवाल दान की उस महान परंपरा की एक और मिसाल बन गए है जिस पर भारत-भूमि को नाज है। महर्षि दधीचि ने अपना शरीर इसलिए दान दिया था, ताकि उनकी अस्थियों से दैत्यों के संहार के लिए धनुष बनाया जा सके। राजा शिवि ने कबूतर को बचाने के लिए अपने शरीर को दान कर दिया था। पौराणिक काल से लेकर मौजूदा आधुनिक और वैज्ञानिक युग तक देह का दान करने वाले महान दानियों की कड़ी में डा. पीपी जायसवाल का नाम भी जुड़ गया है जिनकी पार्थिव देह अब उदयपुर के शासकीय मेडिकल कालेज के उन छात्रों को रिसर्च का अवसर प्रदान करेगी, जो निकट भविष्य में कुशल चिकित्सक के रूप मे समाज में आएंगे और डा.जायसवाल जैसे महान चिकित्सकों के जीवन से प्रेरित होकर मानवता की सच्ची सेवा करेंगे।
नीमच के नया बाजार स्थित जायसवाल हॉस्पिटल के संचालक डॉ. परमेश्वर प्रसाद जायसवाल (90) का शनिवार को निधन हो गया था। इसी दिन अपराह्न को पुरानी नगर पालिका के मकान नं. 86-87 स्थित उनके आवास से देहदान यात्रा निकली गई, जो शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए फव्वारा चौबनक पहुंची। यहां उनकी अंतिम इच्छा अनुसार परिजनों द्वारा महर्षि दधीचि देह-अंगदान यज्ञ संस्थान के माध्यम से उनके पार्थिव शरीर का दान किया गया। संस्थान की ओर से डा. परमेश्वर प्रसाद जायसवाल के पुत्रों डा. राजेंद्र प्रसाद और डॉ. यशपाल जायसवाल समेत परिवारीजनों को एक प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया। नीमच के राजनीतिक, सामाजिक, चिकित्सा और शिक्षा जगत से सैकड़ों लोगों ने डा. जायसवाल को नम आंखों से अंतिम विदाई दी। डा. जायसवाल की पार्थिव देह को उदयपुर के शासकीय मेडिकल कालेज ले जाया जा रहा है। रविवार को उनकी श्रद्धांजलि सभा में नीमच और आसपास के क्षेत्रों से हजारों लोगों ने उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित किए।
डा. जायसवाल के बारे में कहा जाता है कि अपने पेशे के प्रति उनका पैशन इस कदर था, कि जीवन के अंतिम दौर में भी फोन पर मरीज देखने चले जाते थे, पूरे जीवन गरीब मरीजों की निस्वार्थ सेवा करते रहे। जाने कितने ऐसे मरीजों को उपचार कर दुरुस्त किया, जिनके पास हंगे उपचार के लिए पैसे तक नहीं थे। इसीलिए डा. जायसवाल पहचान गरीबों के महीसा के रूप में जाने जाते थे। डा. परमेश्वर का जन्म 1929 में एक संपन्न परिवार में हुआ था।। उन्होंने दिल्ली के तिबिया कालेज से मेडिकल की डिग्री प्राप्त की और उसके बाद शासकीय सेवा में नीमच में रहे। बाद में बड़वानी में भी पोस्टिंग हुई। गरीबों की सेवा करने की इच्छा से ही उन्होंने जायसवाल अस्पताल की स्थापना की, जो आज नीमच शहर का प्रमुख अस्पताल है।
डा. जायसवाल नीमच के कलचुरी समाज की प्रमुख हस्ती थे और जिला जायसवाल समाज के अध्यक्ष भी रहे। नीमच में कलचुरी समाज के आराध्य भगवान श्री सहस्त्रबाहु समारोह के प्रथम आयोजन का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। यही नहीं, समाज के मंदिरों और पुरातन संपदा के रखरखाव को लेकर भी वह काफी सजग और तत्पर रहते थे। हरदेव लाला मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य में आपने तन-मन-धन से बढ़चढ़ कर योगदान किया ।
डा. जायसवाल अपने पीछे भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। आपके दो पुत्र डा. राजेंद्र कुमार जायसवाल और डा. यशपाल जायसवाल पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए एक कुशल चिकित्सक के रूप मे समाज की सेवा कर रहे हैं। तीन पुत्रियां श्रीमती मीरा, श्रीमती शैलेष और श्रीमती जयश्री हैं। पौत्र डा. शिवम उभरते हुए चिकित्सक हैं.।
समाचार
कई जिंदगियां संवारेगी डा. परमेश्वर जायसवाल की पार्थिव देह..श्रद्धांजलि सभा में उमड़ा नीमच
- by admin
- October 29, 2016
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- 9 years ago









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