June 13, 2026
शिवहरे वाणी, D-30, न्यू आगरा, आगरा-282005 [भारत]
समाचार

बीमारी से टूट गई थी अनुभूति जायसवाल, फांसी लगाकर जान दे दी

भागलपुर//ग्वालियर। 
यह जरूरी नहीं कि कोई गंभीर बीमारी उसके पीड़ित व्यक्ति को मृत्य तक ले ही जाए। चिकित्सक भी आखिरी वक्त तक किसी‘चमत्कार की उम्मीद’रखते हैं। लेकिन कई बार पीड़ित व्यक्ति हताश होकर खुद को मृत्यु तक ले जाता है। ऐसा तब होता जब उम्मीदें टूट जाती हैं। यह बेहद चिंताजनक है कि समाज में बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों द्वारा खुदकुशी किए जाने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कैंसर की बीमारी से अनुभूति जायसवाल इस कदर हताश हो गई, कि उसने खुदकुशी कर ली। 
भागलपुर के पूर्व कमिश्नर अखिलेश्वर गिरी की पुत्री अनुभूति जायसवाल दो वर्ष से कैंसर से पीड़ित थीं। बीते रविवार की रात उसने अपने घर (ससुराल) में फांसी लगाकर जान दे दी। अनुभूति ने एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है जिसमें उसने इस कदम के लिए खुद को ही जिम्मेदार बताया है। बता दें कि दो दिन पूर्व ही ग्वालियर में मनीष शिवहरे नाम के एक युवा व्यवसायी ने भी आत्महत्या कर ली थी। बताया जा रहा है कि मनीष ने कारोबार के बिगड़े हाल और बीमारी से तंग आकर जान दी थी। 
अनुभूति जायसवाल भागलपुर (बिहार) के जोगसर थाना क्षेत्र में अपने ससुराल में रह रही थी। अनुभूति के पति संजीव जायसवाल होटल इंडस्ट्री में थे और काफी समय से यूगांडा और कीनिया में पोस्टेड थे। लेकिन, कोरोना काल में भागलपुर लौट आए और तब से परिवार के मेडिकल स्टोर में हाथ बंटा रहे हैं। अनुभूति भी एक सामान्य महिला की तरह पति और बच्चों के साथ एक खुशहाल जीवन बिताना चाहती थीं। लेकिन दो साल पहले कैंसर की बीमारी ने उसके जीवन को नरक बना दिया। ‘दर्द, दवाओं और डाक्टरों’ से वह परेशान हो गई थीं। अनुभूति के दो बच्चों में बेटा सात्विक नवीं कक्षा का छात्र है। अनुभूति के पिता अखिलेश्वर गिरी पहले भागलपुर में एसडीएम बाद में भागलपुर के आयुक्त भी रहे थे। 
अनुभूति ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि उसके पति संजीव जायसवाल बहुत अच्छे इंसान हैं, उसका बहुत ख्याल रखते हैं। मैं दवाइयों और डॉक्टरों से परेशान हो चुकी हूं। उसने लिखा, ‘मैं अपनी बीमारी से तंग आकर जान दे रही हूं। मेरी खुदकुशी के पीछे कोई और वजह नहीं है। मेरे पति और ससुरालवाले बहुत अच्छे हैं और मेरा बहुत अच्छे से ख्याल रखते हैं। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है। मैं भी अपने बच्चों के साथ जीना चाहती थी लेकिन मुझे लगता है कि इस बीमारी के चलते ऐसा हो नहीं सकेगा। इस बीमारी ने मुझे तोड़कर रख दिया है। दो सालों से मैं दवाओं और डाक्टरों के भरोसे जी रही हूं। ’
आगे उसने लिखा, अब मैं बहुत तंग आ चुकी हूं। यह मेरा एक-दो दिन का निर्णय नहीं है, बल्कि मैं पिछले छह महीने से ऐसा करने की सोच रही थी। मेरी एलआईसी पॉलिसी की राशि मेरे दोनों बच्चों को दे दी जाएं। मेरे नाम जो जमीन है, उसका अधिकार मेरे बेटे सात्विक को दे दिया जाए। मैं मम्मी-पापा से माफी मांगती हूं। उन्होंने हमारे के लिए बहुत कुछ किया। मुझे अपने बच्चों को छोड़कर जाने का दुख है। सब लोग मुझे माफ कर देना। आई एम सॉरी- अनुभूति
आंकड़े बताते हैं कि 21 फीसदी से अधिक मामलों में खुदकुशी का प्रमुख कारण बीमारी होता है। यानी हर पांच में से एक आत्महत्या बीमारी के कारण होती है। बहुत ताजा आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन अनुमान है कि बिगड़ती आर्थिक स्थितियों में ऐसी प्रवृत्ति बढ़ी है। उपचार लगातार महंगा हो रहा है, ऐसे में पीड़ित को जब यह दिखाई देता है कि उसका परिवार, उसके इलाज पर इतना खर्च कर रहा है कि वह कर्जे में आ जाएगा और इसके बाद भी पूरे उपचार की गुंजाइश नहीं है, तब वह खुदकुशी को बेहतर विकल्प मान लेता है। 
 

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